स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार, नारे बनाम नारी की मौत?* राजेन्द्र सिंह जादौन

 

✍️राजेन्द्र सिंह जादौन

 

नरेंद्र मोदी अपने 75वें जन्मदिन पर धार से “स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार” योजना का शुभारम्भ करते हैं। मंच सजता है, तालियाँ बजती हैं, फूल बरसते हैं और घोषणा होती है कि अब हर नारी स्वस्थ होगी और हर परिवार सशक्त। लेकिन हकीकत का कड़वा सच यह है कि मध्यप्रदेश आज भी मातृ मृत्यु दर में पूरे देश में सबसे ऊपर खड़ा है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि यहाँ हर एक लाख प्रसव पर 159 औरतें अपनी जान गंवा रही हैं। राष्ट्रीय औसत 88 है और मध्यप्रदेश दोगुना बोझ ढो रहा है। ज़रा सोचिए, यह किसका अपमान है? उस माँ का जो बच्चे को जन्म देने की कीमत अपनी जान देकर चुकाती है या उस परिवार का जिसे हर नये जन्म के साथ मातम भी झेलना पड़ता है।

प्रधानमंत्री मंच से बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन जरा उस माँ की हालत देखिए जो एंबुलेंस के इंतजार में खटिया पर पड़ी है। सरकार आंकड़े गिनाती है कि राज्य में दो हज़ार से ज्यादा एंबुलेंस दौड़ रही हैं, रोज़ाना नौ हज़ार मरीज अस्पताल पहुँचाए जाते हैं। लेकिन यह कागज़ी आंकड़े उस तस्वीर को नहीं ढक पाते जहाँ किसी गाँव की गर्भवती महिला को बैलगाड़ी पर डालकर अस्पताल ले जाया जाता है और रास्ते में ही बच्चा जन्म ले लेता है। कई बार सड़क किनारे, कई बार खटिया पर और कई बार सीधे श्मशान घाट तक पहुँचने वाली कहानियाँ ही असल सच्चाई हैं।

संस्थागत प्रसव का प्रतिशत बढ़ा है, सरकार इस पर ताल ठोकती है कि 91 प्रतिशत महिलाएँ अब अस्पताल में बच्चे को जन्म दे रही हैं। लेकिन अस्पताल पहुँचकर क्या होता है? नर्सें नदारद, डॉक्टर अनुपस्थित, लेबर रूम खाली और ऑपरेशन थिएटर बंद। क्या यही है वह “सशक्त परिवार” का सपना? अगर माँ को समय पर ऑक्सीजन न मिले, अगर खून चढ़ाने की सुविधा न हो, अगर एनेस्थीसिया देने वाला डॉक्टर ही मौजूद न हो तो अस्पताल भी कब्रगाह से कम नहीं।

शिशु मृत्यु दर का हाल और भी भयानक है। प्रदेश में हर 1000 जन्मों पर 40 बच्चे अपने पहले जन्मदिन तक जिंदा नहीं रहते। यह आँकड़ा उस पूरे नारे को शर्मिंदा करता है कि परिवार तभी सशक्त होगा जब नारी स्वस्थ होगी। सवाल यह है कि जिस राज्य में हर दिन औसतन दर्जनों बच्चे दम तोड़ दें, वहाँ किस परिवार की नींव मजबूत होगी?

यह सब सुनकर नेता जवाब देते हैं कि हम योजना ला रहे हैं, बजट दे रहे हैं, नई घोषणाएँ कर रहे हैं। लेकिन जनता पूछती है कि योजना किसे चाहिए और जिंदगी किसे चाहिए? माँ को नारे नहीं चाहिए, उसे एंबुलेंस चाहिए। उसे कागज़ी उपलब्धियाँ नहीं चाहिए, उसे अस्पताल का डॉक्टर चाहिए। उसे राजनीतिक भाषण नहीं चाहिए, उसे समय पर खून की बोतल चाहिए।

मध्यप्रदेश की माताएँ हर रोज़ इस सिस्टम की पोल खोल रही हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री मंच से कहते हैं कि नारी शक्ति, मातृ शक्ति, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, तो दूसरी तरफ वही नारी प्रसव पीड़ा में अस्पताल तक पहुँचने से पहले दम तोड़ देती है। क्या यही है वह ‘अमृतकाल’ जिसमें देश प्रवेश कर रहा है? क्या यही है वह विकास मॉडल जिसमें गाँव-गाँव माताएँ अपने बच्चों की लाश को कंधे पर उठाती हैं?

हकीकत यह है कि “स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार” जैसे नारे सिर्फ भाषण की तासीर रखते हैं। जब तक आंकड़े बदलेंगे नहीं, जब तक मौत का यह ग्राफ नीचे नहीं आएगा, जब तक गाँव की औरत सड़क पर बच्चे को जन्म देती रहेगी, तब तक यह योजना सिर्फ राजनीतिक मजाक है। मोदी जी और उनकी सरकार कितनी भी कोशिश कर लें, ये आंकड़े उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे। मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर की यह भयावह तस्वीर हर बार उनकी हर नयी योजना को नंगा कर देती है।

आज जरूरत है कि इस ढकोसले को बंद किया जाए। आंकड़ों को चमकाने के बजाय ज़मीन पर अस्पतालों को ठीक किया जाए, एंबुलेंस को सही समय पर पहुँचाया जाए, डॉक्टरों को मजबूरी नहीं जिम्मेदारी समझकर सेवा में खड़ा किया जाए। जब तक नारी को स्वास्थ्य का हक नहीं मिलेगा, तब तक परिवार सशक्त नहीं हो सकता। और जब तक परिवार सशक्त नहीं होगा, तब तक देश के विकास का दावा झूठा ही रहेगा।

सच यही है कि “स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार” फिलहाल नारे और हकीकत के बीच झूलता एक खोखला सपना है।

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