अफसरों के बंगलों पर झाड़ू लगाने को मजबूर मध्यप्रदेश के सिपाही

महाकाल बाबा के दरबार से उठी 5500 पुलिसकर्मियों की गुहार – अफसरों के बंगलों पर झाड़ू लगाने को मजबूर मध्यप्रदेश के सिपाही”

उज्जैन |

 

मध्यप्रदेश पुलिस के 5500 से अधिक ट्रेड आरक्षकों ने देश में शायद पहली बार एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अपनी पीड़ा सीधे न्याय के देवता महाकाल बाबा के दरबार में रखी है। इन सिपाहियों ने उज्जैन से एक सामूहिक प्रार्थना-पत्र भेजकर मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की गुहार लगाई है।

पत्र में ट्रेड आरक्षकों ने बताया है कि उन्हें जनता की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निजी बंगलों में घरेलू नौकरों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है जिसमें झाड़ू-पोंछा, बर्तन धोना, साफ सफाई करना, खाना बनाना, बच्चों और पालतू कुत्तों की देखभाल जैसे कार्य उनसे कराए जा रहे हैं — जो न केवल संविधान बल्कि मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है।
डीजीपी नंदन दुबे ने 2012 में छीना हक़
ट्रेड आरक्षकों ने अपने पत्र में बताया है कि पहले मध्यप्रदेश में नियम जी.ओ.पी-57/93 के तहत 5 वर्ष की सेवा के बाद उन्हें जनरल ड्यूटी (GD) में संविलियन किया जाता था। इससे वे फील्ड में कानून व्यवस्था संभालते थे। लेकिन वर्ष 2012 निजी स्वार्थ के लिए बदल दी गई और व्यवस्था अचानक जी.ओ.पी-57/93 बंद कर दी गई, जिससे 5500 जवान में से कई आज भी अफसरों की निजी सेवा में फँसे हुए हैं। जिसमें हर साल 250 से 300 करोड़ रुपये की बर्बादी!
ट्रेड आरक्षकों ने चौंकाने वाला आंकड़ा भी उजागर किया है।
प्रदेश के 5500 ट्रेड आरक्षकों पर सरकार सालाना लगभग ₹250-300 करोड़ लगभग कर रही है, जबकि वही काम आउटसोर्स से सिर्फ ₹45 करोड़ रु सालाना खर्च में हो सकता है। यानी हर साल लगभग ₹250 करोड़ की सीधी बर्बादी — जो आम जनता के टैक्स से प्राप्त होने वाली राशि का पैसा है।
कानून भी कहता है — यह गलत है
मद्रास हाईकोर्ट पहले ही अर्दली प्रथा को अवैध बता चुका है।
Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 13 के अनुसार भी सरकारी स्टाफ को निजी सेवा में लगाना भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।
फिर भी मध्यप्रदेश में यह व्यवस्था वर्षों से चल रही है।
अब महाकाल बाबा के दरबार से मुख्यमंत्री को पुकार
ट्रेड आरक्षकों ने अपने पत्र में मुख्यमंत्री से सीधे नहीं, बल्कि महाकाल बाबा के दरबार में प्रार्थना पत्र शिवलिंग पर समर्पित कर प्रार्थना कर मुख्यमंत्री के हृदय में करुणा जगाने की गुहार लगाई है।
पत्र में लिखा है—
“हमारी वर्दी आज अपमान से झुकी हुई है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे न कहें कि उनके पिता गुलाम है।”

राजनीतिक हलकों में हलचल
यह मामला अब तेजी से तूल पकड़ रहा है। पुलिस परिवार और उनके सहयोगियों के अनुसार मुख्यमंत्री कार्यालय तक यह पत्र और इसकी प्रति पहुँच चुकी है। यदि इस पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मुद्दा जल्द ही एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है।

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