मध्यप्रदेश में मौतों का मातम था, पर सत्ता के महलों में पिकनिक का मौसम।’’

 

मौत पर पिकनिक का मंत्रिमंडल मध्यप्रदेश?

✍️ राजेन्द्र सिंह जादौन

9 दिसंबर 2025 को मध्यप्रदेश ने एक विचित्र दृश्य देखा इतना विचित्र कि खुद लेखक भी शर्मिंदा हो जाए और बोले, “भाई, ये मैं नहीं लिख सकता।” पर प्रदेश के हालात हैं कि लेखक अभी भी कलम थामकर खड़ा है, क्योंकि सत्य ने जो तमाचा मारा है, उसकी गूँज आज तक शांत नहीं हुई।

खजुराहो, जहाँ सभ्यता और संस्कृति की मूर्तियाँ दुनिया को दिखाती हैं कि कला क्या होती है, इतिहास क्या होता है वहीं पर प्रदेश की राजनीति ने दिखाया कि असंवेदनशीलता क्या होती है और निर्लज्जता किसे कहते हैं। मंत्रिमंडल की बैठक चल रही थी, कैमरे थे, सुरक्षाकर्मी थे, वाहनों का काफिला था, पूरा सरकारी तामझाम था जैसे किसी महाकुंभ का आयोजन हो।
पर उस शोर-शराबे से दूर, किसी फटी हुई थाली में परोसे गए भोजन से कुछ लोग मौत से जा मिले और कुछ अस्पतालों के बेड पर पड़े जिंदगी की साँसें गिनते रह गए। खाना खाने से मौतें। एक सरकारी सिस्टम में, एक सरकारी तंत्र के बीच, एक सरकारी निगरानी वाले इलाके में मौतें।

पर सरकार सरकार अपने मूड में थी। मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्रिमंडल खजुराहो की मस्ती में डूबा था। बैठक खत्म हुई, और प्रदेश की सुर्खियों में जो बात सबसे ऊंची थी वह ये कि “नेताओं ने पिकनिक की।” हवा थी, मौसम था, मुस्कुराहटें थीं और फोटो खिंच रहे थे। कोई बता नहीं सकता था कि कुछ ही घंटों पहले मौत ने किसी घर का दरवाजा खटखटाया है। प्रदेश के मुखिया का चेहरा कैमरों में चमक रहा था, मगर प्रदेश के लोग अँधेरे में पड़े थे।

वरना पूछने वाला कोई तो होता कि मरने वाले कौन थे? अस्पताल में पड़े लोग किस हाल में हैं?।पर काफिले में यह सवाल ले जाने की जगह ही कहाँ बची है? क्योंकि सड़क पर धूल उड़ाता सरकता हुआ सरकारी जत्था सवालों में नहीं, सिर्फ घोषणाओं में विश्वास रखता है।

इधर जब गाँव में मातम पसरा, परिजनों ने गुस्से में पोस्टरों पर कालिख पोती जो गुस्सा नहीं, बल्कि व्यवस्था की चिता पर फेंका गया पहला अंगारा था। मोहन यादव हों या मोदी पोस्टर जनता के भरोसे और गुस्से का कैनवस बन गए।।पोस्टर फाड़े गए क्योंकि कहीं न कहीं लोगों को लग रहा था कि यह सरकार उनकी नहीं है। जो उनकी मौत पर मुस्कुराती हुई फोटो खिंचवा सकती है, वह उनके दर्द को क्या समझेगी?

लेकिन उन पोस्टरों के फटने की आवाज़ मंत्रिमंडल की संगीत-रात्रि तक पहुँची ही नहीं। या फिर पहुँच भी गई हो, पर वहाँ सुनने वाला कोई नहीं था। क्योंकि जब सत्ता पिकनिक मोड में आ जाती है, तो जनता की चीखें भी ऑफ-बीट बैकग्राउंड नॉइज़ बन जाती हैं।

मध्यप्रदेश का ये दृश्य इतना क्रूर था कि किसी फिल्म में डाल दिया जाए, तो दर्शक कहेंगे “ये ओवर एक्टिंग है।”
पर यहां यह ओवर एक्टिंग नहीं, बल्कि ओवर कॉन्फिडेंस था सत्ता का ओवर कॉन्फिडेंस। सत्ता को भरोसा है कि जनता कुछ नहीं करेगी, चुप बैठी रहेगी, और चुनाव आएगा तो फिर वही पुरानी लाइन पर वोट डलवा देगी।

परिजनों के गुस्से में कालिख थी, पर सरकार के चेहरे पर तेज था जैसे सब कुछ बिल्कुल सही हो।कमाल की बात ये कि पूरा मंत्रिमंडल मौजूद था, पूरा सरकारी तंत्र मौजूद था, सबके पास फोन थे, सबके पास सूचना तंत्र था, पर किसी मंत्री ने मुड़कर भी नहीं देखा कि प्रदेश में कुछ लोग भोजन से मर रहे हैं। एक भी मंत्री इतना व्यस्त नहीं था कि अपनी गाड़ी मोड़कर अस्पताल चला जाए।

लगता था जैसे मंत्रियों की बैठक “मध्यप्रदेश विकास परिषद” की जगह “मध्यप्रदेश मनोरंजन समिति” बन गई हो जहाँ एजेंडा सिर्फ इतना था कि बैठक के बाद घूमना कहाँ है, फोटो कहाँ खिंचवानी है और शाम का हाई-टी कौन सा है।

इधर मौतें हो रही थीं, उधर फोटो सेशन चल रहे थे।
इधर लोगों की चीखें थीं, उधर चाय की चुस्कियाँ थीं।
इधर पोस्टर फाड़े जा रहे थे, उधर कैमरे में मुस्कानें कैद हो रही थीं।

प्रदेश की विडंबना इतनी बड़ी है कि शब्द छोटे पड़ जाएँ क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकार जनता की लाशों के सामने भी “मूड में” है। सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि मौतें हुईं सबसे बड़ा संकट यह है कि मौतों को नोटिस करने वाला कोई नहीं है। एक सिस्टम इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है कि मौत और पिकनिक एक ही दिन में, एक ही प्रदेश में, एक ही सरकार के साये में, साथ-साथ चल रहे हों?

विडंबना देखिए परिजनों ने पोस्टर फाड़े, सरकार ने तस्वीरें खिंचवाईं। परिजनों ने कालिख पोती, सरकार ने चश्मा पहनकर दृश्य सुंदर दिखाने की कोशिश की।
परिजनों ने चीखा, सरकार ने कान में प्लग लगा लिए क्योंकि पिकनिक के माहौल में शोर पसंद नहीं आता।

राज्य की राजनीति अब इतनी बेशर्म हो चुकी है कि यह मानकर चलती है कि जनता रोएगी, चीखेगी, गुस्सा करेगी, फिर भी अगले चुनाव तक सब ठंडा हो जाएगा।
इसलिए सत्ता ने “दायित्व” को त्याग कर “आनंद” को अपना लिया है। जब प्रशासन “सम्मान” की जगह “सुविधा” का दास बन जाता है, तब यही दृश्य पैदा होते हैं जहाँ मौतें रजिस्टर में दर्ज होती हैं और मंत्री इंस्टाग्राम में।

खजुराहो की मूर्तियाँ हजारों साल पुरानी हैं, पर आज पहली बार वे भी शरमा रही होंगी क्योंकि आज के नेता उनसे भी ज्यादा कठोर, ज्यादा पत्थर, और ज्यादा नक़्क़ाशीदार निकल गए।

प्रदेश पूछ रहा है क्या नेतृत्व का मतलब सिर्फ कैमरे में दिखने तक सीमित रह गया है? क्या मौतें अब सिर्फ एक ब्रेकिंग न्यूज हैं? क्या जनता सिर्फ पोस्टर फाड़ने लायक रह गई है, और नेता पिकनिक पर जाने लायक?

9 दिसंबर 2025 ने साबित किया कि मध्यप्रदेश में शासन व्यवस्था सिर्फ एक गाड़ी का काफिला है, एक होटल का बिल है, एक बैठक का फोटो है बाकी सब जनता की समस्या है, और जनता की समस्याएँ अब सत्ता की प्राथमिकता नहीं रहीं। मौतें हों, दुर्घटनाएँ हों, बीमारी हो सत्ता का कार्यक्रम स्थिर है: बैठक, मीडिया बाइट, और… पिकनिक।

कहने को प्रदेश का नेतृत्व “जनता का सेवक” है, पर बेचारा सेवक इतना व्यस्त है कि जिन्दगी और मौत की खबरें भी उसकी दिनचर्या को बाधित नहीं कर पातीं।

अगर इस दृश्य को एक लाइन में समेटा जाए तो वह यही होगी “मध्यप्रदेश में मौतों का मातम था, पर सत्ता के महलों में पिकनिक का मौसम।’’

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